Happy New Year: नया साल 1 जनवरी को ही क्यों? जानिए इसके पीछे की रोचक कहानी

Update: 2025-03-30 02:24 GMT
नया साल 1 जनवरी को ही क्यों? जानिए इसके पीछे की रोचक कहानी
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Happy New Year : 31 दिसंबर की रात जैसे ही घड़ी में 12 बजे, पूरी दुनिया रंग-बिरंगी रोशनी, पटाखों की आवाज और खुशियों के शोर में डूब जाती है। हर कोई 1 जनवरी को नए साल का जश्न मनाने में व्यस्त हो जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि साल की शुरुआत 1 जनवरी से ही क्यों मानी जाती है? क्या यह सिर्फ एक परंपरा है या इसके पीछे कोई दिलचस्प कहानी छिपी है? और भारत में, जहां सांस्कृतिक विविधता और अलग-अलग कैलेंडर मौजूद हैं, वहां नया साल 1 जनवरी को क्यों मनाया जाता है?

दरअसल अंग्रेजों के शासनकाल में आधिकारिक तौर पर ग्रेगोरियन कैलेंडर को अपनाया गया और धीरे-धीरे यह कैलेंडर हमारी दिनचर्या का हिस्सा बन गया। सरकारी कामकाज, शिक्षा प्रणाली और अंतरराष्ट्रीय संपर्क ने इसे इतना प्रभावी बना दिया कि लोग 1 जनवरी को ही नए साल के रूप में मनाने लगे।

आइए जानते हैं कि 1 जनवरी ने पूरी दुनिया में नए साल का प्रतीक बनने का सफर कैसे तय किया और भारत में भी इस दिन को इतना खास क्यों माना जाने लगा।

कैसे हुई 1 जनवरी से नए साल की शुरुआत?

1 जनवरी को नया साल मनाने की परंपरा का इतिहास प्राचीन रोमन साम्राज्य से जुड़ा हुआ है। 45 ईसा पूर्व, जब रोमन साम्राज्य में कैलेंडर का चलन शुरू हुआ था, तब रोम के राजा नूमा पोंपिलुस के समय में कैलेंडर में सिर्फ 10 महीने होते थे, साल में 310 दिन और सप्ताह में 8 दिन। बाद में नूमा पोंपिलुस ने कैलेंडर में बदलाव किए और जनवरी को साल का पहला महीना घोषित किया।

हालांकि, 1 जनवरी को नया साल मनाने का आधिकारिक चलन 1582 में ग्रेगोरियन कैलेंडर की शुरुआत के बाद हुआ। इस कैलेंडर को पोप ग्रेगोरी XIII ने बनाया और धीरे-धीरे ये पूरी दुनिया में मान्य हो गया। तभी से 1 जनवरी को नए साल की शुरुआत मानने की परंपरा प्रचलित हुई।

जनवरी कैसे बना साल का पहला महीना?

प्राचीन काल में साल की शुरुआत मार्च से मानी जाती थी, जो वसंत ऋतु का प्रतीक होता था। मार्च का नाम रोमन युद्ध के देवता 'मार्स' के नाम पर रखा गया था। लेकिन, जब राजा नूमा पोंपिलुस ने कैलेंडर में बदलाव किए, तो उन्होंने जनवरी को साल का पहला महीना घोषित किया।

जनवरी का नाम रोमन देवता 'जेनस' के नाम पर रखा गया था। जेनस की खासियत यह थी कि उनके दो चेहरे थे...एक आगे की ओर और एक पीछे की ओर। आगे देखने वाला चेहरा नई शुरुआत का प्रतीक था और पीछे देखने वाला चेहरा बीते समय का। इसी प्रतीकात्मकता के आधार पर नूमा ने जनवरी को साल की शुरुआत का महीना बनाया।

1582 में ग्रेगोरियन कैलेंडर लागू होने के बाद यह परंपरा और भी पक्की हो गई और जनवरी हमेशा के लिए साल का पहला महीना बन गया।

कैसे बना ग्रेगोरियन कैलेंडर?

ग्रेगोरियन कैलेंडर का निर्माण जीसस क्राइस्ट के जन्म से 46 साल पहले रोमन राजा जूलियस सीज़र ने नई गणनाओं के आधार पर किया। उन्होंने 1 जनवरी से साल की शुरुआत की घोषणा की थी। यह कैलेंडर धरती के सूर्य की परिक्रमा करने के समय पर आधारित था, जो लगभग 365 दिन और 6 घंटे का होता है।

हालांकि जब जनवरी और फरवरी को जोड़ने की कोशिश की गई, तो यह गणना सूर्य की परिक्रमा के साथ सही तालमेल नहीं बिठा पाई। इस समस्या को हल करने के लिए खगोलविदों ने गहन अध्ययन किया।

सौर और चंद्र चक्र के आधार पर कैलेंडर बनाए जाते हैं। चंद्र चक्र पर आधारित कैलेंडर में 354 दिन होते हैं, जबकि सौर चक्र पर आधारित कैलेंडर में 365 दिन। ग्रेगोरियन कैलेंडर पूरी तरह से सूर्य चक्र पर आधारित है, इसलिए इसे अधिक सटीक और सही माना गया।

1582 में, पोप ग्रेगोरी XIII ने इसमें सुधार करते हुए इसे आधिकारिक रूप से लागू किया और तब से अधिकांश देशों ने इसे अपनाया। आज भी, यही कैलेंडर पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा प्रचलित है।

भारत में 1 जनवरी को नया साल क्यों मनाते हैं?

भारत में 1 जनवरी को नया साल मनाने की परंपरा ब्रिटिश शासन के दौरान शुरू हुई, जब ग्रेगोरियन कैलेंडर को सरकारी कामकाज और शिक्षा प्रणाली में आधिकारिक रूप से अपनाया गया। समय के साथ अंतरराष्ट्रीय संपर्क, आधुनिक जीवनशैली और वैश्विक मानकों के कारण यह कैलेंडर आम लोगों की जिंदगी का हिस्सा बन गया।

लेकिन सवाल यह उठता है कि यह हमारा नया साल भी नहीं है, फिर भी लोग इसे क्यों मानते हैं? दरअसल, ग्रेगोरियन कैलेंडर भले ही भारतीय परंपराओं का हिस्सा न हो, लेकिन सरकारी कामकाज, शिक्षा, व्यापार और अंतरराष्ट्रीय संबंधों में इसका व्यापक इस्तेमाल होता है। यही कारण है कि लोग इसे अपनी दिनचर्या में शामिल कर चुके हैं और 1 जनवरी को नए साल के रूप में मनाना अब एक प्रचलन बन चुका है।

इसके अलावा नए साल का जश्न मनाना अब सिर्फ एक तारीख नहीं बल्कि खुशी, उमंग और सामाजिक मेल-जोल का अवसर भी बन चुका है। भले ही भारत में विभिन्न क्षेत्रों में पारंपरिक कैलेंडरों के आधार पर अलग-अलग दिनों को नया साल मनाया जाता है, फिर भी 1 जनवरी का जश्न सभी को एकजुट करने का एक माध्यम बन गया है।

आज के समय में हिंदू परिवारों में भी 1 जनवरी को नया साल मनाने का चलन बढ़ता जा रहा है। इसकी वजह सिर्फ आधुनिकता की ओर झुकाव ही नहीं, बल्कि वैश्विक संपर्क, सोशल मीडिया और मनोरंजन के साधनों का व्यापक प्रभाव भी है। लोग खुद को दुनिया से जुड़े रखना चाहते हैं और यही कारण है कि 1 जनवरी का जश्न अब हर वर्ग और धर्म के बीच लोकप्रिय होता जा रहा है।

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