जनसेवा मित्र योजना: क्या सच में हुई युवाओं से वादा खिलाफी, मंच से की घोषणा और विधानसभा में दिया जवाब अलग...फाइलें लेकर भटक रहे युवा

जनसेवा मित्र योजना के तहत चयनित युवाओं के लिए स्थायी रोजगार की मांग करते युवा (फाइल फोटो)
वादों की बारिश हुई, सपनों का मेला सजा,
चुनाव का मौसम आया, हर दिल को लुभाया गया।
कसमें खाईं, दावे किए, जीत की कुर्सी मिली,
फिर सभी वादे भुला दिए गए।
यह कहना है मध्यप्रदेश के उन युवाओं का जिनसे वादा किया गया कि, उनके भविष्य की जिम्मेदारी अब सरकार की होगी। इन युवाओं को मध्यप्रदेश में 'जनसेवा मित्र' के नाम से जानते हैं। पूरे MP में ऐसे 9390 युवा हैं। चुनाव से पहले किए गए वादों का सरकार के वित्तीय प्रबंधन, योजना के क्रियान्वयन और सिस्टम से जब सामना होता है तो क्या स्थिति बनती है उसका उदहारण अब ये जनसेवक बन गए हैं। मामला क्या है, यह मुद्दा चर्चा में क्यों है और क्यों ऐसे विषय पर चर्चा की जानी आवश्यक है यह जानने के लिए पढ़िए यह रिपोर्ट।
4 अगस्त 2023 - तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भोपाल के लाल परेड ग्राउंड से घोषणा की कि, जनसेवा मित्र अंतिम पंक्ति पर खड़े व्यक्ति तक लाभ पहुंचाएंगे। इसके लिए उन्हें गाड़ियां और महीने के 200 रुपए का डाटा मिलेगा। यह योजना अगली सरकार में भी चालू रहेगी। इसे समाप्त नहीं किया जाएगा। आप काम करो और अपने भविष्य की जिम्मेदारी मुझे सौंप दो।
2025 में मध्यप्रदेश विधानसभा का बजट सत्र - विधायक जगन्नाथ रघुवंशी ने सरकार से इस योजना को लेकर सवाल पूछा तो जवाब मिला कि, फरवरी 2023 में 4695 और अगस्त 2023 में दोबारा 4695 जनसेवा मित्रों को कौशल विकास के लिए इंटर्नशिप प्रदान की गई। पहले चरण में पात्र पाए गए जनसेवा मित्रों की कार्य अवधि 6 महीने बढ़ाई गई जबकि दूसरी बार चयनित जनसेवा मित्रों को 6 महीने ही इंटर्नशिप दी गई। यह स्कीम जनवरी 2024 में खत्म हो गई है। इसलिए पुनः नियुक्ति का कोई प्रश्न ही नहीं।
पहले जानिए क्या थी जनसेवा मित्र योजना :
"जनसेवा मित्र योजना" पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल में शुरू की गई थी। इसका उद्देश्य राज्य के युवाओं का कौशल विकास था। योजना का अन्य उद्देश्य सरकारी योजनाओं को हर एक पात्र लाभार्थी तक पहुंचाना भी था। योजना के तहत युवाओं को "जनसेवा मित्र" के रूप में नियुक्त किया गया था, जो गांव - गांव जाकर सरकारी योजनाओं (जैसे लाड़ली बहना, आयुष्मान कार्ड, वृद्धा पेंशन आदि) के लिए फॉर्म भरवाने और जागरूकता फैलाने का काम करते थे।
जनसेवा मित्रों को हर महीने 8,000 रुपये की सैलरी दी जाती थी, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति में भी सुधार हो सके। यह ध्यान देने वाली बात है कि, नियुक्ति के समय यह कभी नहीं कहा गया कि, यह योजना स्थायी है या भविष्य में किसी को स्थायी नौकरी मिलेगी। योजना इंटर्नशिप मॉडल पर तैयार की गई थी।
योजना की शुरुआत 2023 में हुई थी। इसने सरकार के वित्तीय संसाधनों पर अतिरिक्त भार डाला। अगर हर महीने सरकार ने 8 हजार रुपए जनसेवकों को दिए तो अनुमानित रूप से सरकार ने एक साल में करीब 67,60,80,000 करोड़ रुपए खर्च किए।
माना जाता है कि यह योजना खास तौर पर 2023 के विधानसभा चुनावों से पहले युवाओं को आकर्षित करने और ग्रामीण क्षेत्रों में सरकार की पहुंच बढ़ाने के लिए शुरू की गई थी। हालांकि, वर्तमान में यह योजना बंद कर दी गई है।
बता दें कि, योजना के पहले चरण में, मध्य प्रदेश के 313 विकासखंडों में कुल 4,695 जनसेवा मित्रों की नियुक्ति की गई थी। यह जानकारी 2023 में शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा शुरू किए गए "मुख्यमंत्री युवा इंटर्नशिप प्रोग्राम" के तहत सामने आई थी, जिसमें प्रत्येक विकासखंड में औसतन 15 जनसेवा मित्र नियुक्त किए गए थे।
अब जानिए जनसेवा मित्र रहे युवाओं की आपबीती :
जनसेवा मित्र योजना चयनित राहुल कहते हैं - हमें कंसेंट फॉर्म में कहीं नहीं कहा गया कि, यह एक स्थायी जॉब है। हमें जगह - जगह भेजा जाता था चाहे तो कोई आयोजन हो या नेताओं का कार्यक्रम। स्थायी जॉब की अपेक्षा सही नहीं है। मुझे प्राइवेट जॉब में ज्यादा स्कोप दिखा। 8 या 7 हजार रुपए में कुछ नहीं होता। - राहुल सेन
जनसेवा मित्र एक अच्छी योजना थी। इस योजना के तहत हम सरकार की नई - नई योजना का प्रचार करते थे। लाड़ली बहना योजना जब शुरू की गई तो गांव के सचिवों की हड़ताल थी। उनके अंतर्गत आने वाले 9 में 8 गांव में जनसेवा मित्र फॉर्म भरा करते थे। इस योजना को लागू करने में जनसेवा मित्रों का बड़ा योगदान था। विधानसभा और लोकसभा चुनाव के समय भी हमने तमाम योजनाओं का प्रचार किया। इसके बाद मंच से योजना को आगे बढ़ाने की बात कही थी। अब कुछ कारणों से यह बंद कर दी गई है। सिम में बैलेंस और डाटा डलवाने की बात कभी धरातल पर लागू नहीं हुई लेकिन 6 महीने तक हमें 8 हजार रुपए हर महीने मिलते थे। जब हमारा कार्यकाल बढ़ाया गया तो यह राशि बढ़कर 10 हजार रुपए कर दी गई। - राहुल लोधी
हमें शिवराज सिंह चौहान द्वारा बुलाया गया था। मंच से उन्होंने हमारे भविष्य की चिंता अपने हाथों में लेने की बात कही। सरकार का हमने बहुत सहयोग किया। मुख्यमंत्री मोहन यादव जी को बनाया गया। उनके कार्यकाल में हमने दो महीने काम किया। हम अपनी मीटिंग जिला पंचायत या कलेक्ट्रेट में करते थे। सीएम फेलो के माध्यम से हम कलेक्ट्रेट को डायरेक्ट रिपोर्ट करते थे। नियुक्ति के समय हमें सख्त हिदायत थी कि, हम कहीं प्राइवेट या सरकारी जॉब नहीं करेंगे। इससे संबंधित याचिका हाई कोर्ट में भी लगाया गया था लेकिन वह भी खारिज हो गई। हमें मंच से कहा गया कि, भविष्य की चिंता नहीं करना है और अब विधानसभा में कहा जा रहा है कि, योजना समाप्त हो गई। यह तो गलत है। यह तो हमारे भविष्य के साथ खिलवाड़ा है। 28 - 29 साल की उम्र में बेरोजगार होना आसान नहीं होता। हमारा तो जो हुआ सो हुआ लेकिन आने वाले लोगों के लिए सरकार को विचार करना चाहिए। अगर जिन्दा होने की दवा होती तो हम रोज खाते। हमारी तो समाज में इज्जत ही खत्म हो गई। हम पोस्ट ग्रेजुएट हैं। - भानुप्रताप रिछारिया जनसेवा मित्र संगठन के अध्यक्ष
जनसेवा मित्र योजना को लेकर सरकार सवालों के घेरे में है लेकिन बड़ा मुद्दा यहां योजनाओं के वित्तीय प्रबंधन और प्रोडक्टिव आउटकम को लेकर है। इस योजना का उद्देश्य कौशल विकास और सरकार की योजनाओं को अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक पहुंचाने का था। कौशल विकास के नाम पर युवाओं से बस सरकारी योजनाओं के फॉर्म भरवाए गए।
वित्तीय पक्ष की बात की जाए तो सरकार अपनी योजनाओं के प्रचार और क्रियान्वयन के लिए करोड़ों रुपए खर्च करती है। पारदर्शिता के अभाव में यह डाटा सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है कि, आखिर सरकार योजनाओं के प्रचार और क्रियान्वयन के लिए कितने रुपए खर्च करती है। ऐसे में युवाओं का उपयोग कर प्रचार करना इतना गलत निर्णय भी नहीं था। अगर वास्तव में युवाओं के प्रयास से योजनाओं को धरातल पर लागू करने में मदद मिली है तो इस ओर एक बार विचार तो किया ही जाना चाहिए।
बीते कई महीनों से जनसेवा मित्र रहे युवा अपनी फाइलें लेकर शिवराज सिंह चौहान और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के घर और दफ्तर के चक्कर लगा रहे हैं। मंच से कही गई बात लिखित में न होने के चलते यह युवा कानूनी लड़ाई लड़ने के भी पात्र नहीं है। मुख्यमंत्री से केंद्रीय मंत्री बन गए शिवराज सिंह चौहान अपना वादा निभाने की स्थिति में नहीं है। ऐसे में राजनीति से ऊपर उठाकर नीति निर्माताओं को संवेदनशीलता दिखाते हुए मध्य मार्ग ढूंढना चाहिए।