Bilaspur Sterilization Case Verdict

11 साल बाद आया इंसाफ, नसबंदी कांड में डॉक्टर दोषी, 3 घंटे में 83 ऑपरेशन बने मौत की वजह

बिलासपुर नसबंदी कांड में 11 साल बाद फैसला, 15 महिलाओं की मौत के मामले में डॉक्टर दोषी करार। घटना ने देश-विदेश में मचाई थी हलचल।

11 साल बाद आया इंसाफ, नसबंदी कांड में डॉक्टर दोषी, 3 घंटे में 83 ऑपरेशन बने मौत की वजह

Chhattisgarh Court Judgement

बिलासपुर। करीब 11 साल पहले जो दर्द बिलासपुर के गांवों में फैल गया था, उसकी गूंज अब जाकर अदालत के फैसले में सुनाई दी है। नवंबर 2014 के उस नसबंदी कांड में 15 महिलाओं की जान चली गई थी। इसके साथ ही सैकड़ों परिवारों की जिंदगी हमेशा के लिए बदल गई थी। अब इस मामले में अदालत ने लेप्रोस्कोपिक सर्जन डॉ आरके गुप्ता को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई है। हालांकि, इतने लंबे इंतजार के बाद आया ये फैसला भी कई सवाल छोड़ गया है।

कैसे हुआ इतना बड़ा हादसा

यह मामला बिलासपुर जिले के पेंडारी और पेंड्रा में लगाए गए सरकारी नसबंदी शिविरों का है। उस दिन सुबह से ही करीब 40 गांवों की महिलाओं को ऑपरेशन के लिए बुलाया गया था। इसके बाद जल्दबाजी में ऑपरेशन किए गए। महज 3 घंटे में 83 महिलाओं की नसबंदी की गई।

एक प्रशिक्षु के साथ ऑपरेशन

डॉक्टर गुप्ता ने एक ट्रेनी के साथ मिलकर महिलाओं के ऑपरेशन किए। इतना ही नहीं ऑपरेशन के कुछ ही घंटों बाद महिलाओं को घर भेज दिया गया। यहीं से लापरवाही की कहानी शुरू हुई। ऑपरेट की गई महिलाओं की शाम होते-होते तबीयत बिगड़ने लगी।

उल्टी, बुखार और दर्द, फिर मौत का सिलसिला

घर पहुंचने के बाद महिलाओं को उल्टी, तेज बुखार और पेट में असहनीय दर्द की शिकायत होने लगी। हालत बिगड़ती देख परिजनों ने उन्हें अस्पताल पहुंचाया। जहां सिम्स, जिला अस्पताल और निजी अस्पतालों में 100 से ज्यादा महिलाओं को भर्ती किया गया। लेकिन इलाज के दौरान 15 महिलाओं की मौत हो गई। कई परिवारों ने अपनी मां, बहू या बेटी को खो दिया। 

डॉक्टर दोषी, लेकिन सजा पर बहस

इस मामले में जिला अदालत ने डॉ आरके गुप्ता को दोषी मानते हुए 2 साल की सजा और 25 हजार रुपये का जुर्माना लगाया है। साथ ही अन्य धाराओं में भी अलग-अलग सजा सुनाई गई है। हालांकि, इतने बड़े हादसे में सिर्फ 2 साल की सजा को लेकर भी चर्चा शुरू हो गई है। लोग सवाल कर रहे हैं कि क्या ये पर्याप्त है?

दवा में जहर की आशंका, लेकिन सबूत नहीं मिले

घटना के बाद दवा सप्लाई को लेकर भी बड़ा खुलासा हुआ था। आरोप लगे थे कि सिप्रोसिन दवा में चूहामार जहर (जिंक फास्फाइड) की मिलावट थी। इस मामले में कई लोगों के खिलाफ केस दर्ज हुआ। लेकिन अदालत ने सबूतों के अभाव में सभी आरोपियों को बरी कर दिया।

UN ने कहा था ‘घोर मानवीय त्रासदी’

इस घटना की गूंज सिर्फ देश तक सीमित नहीं रही थी। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस पर चिंता जताई गई थी। संयुक्त राष्ट्र से जुड़ी संस्था की उपनिदेशक केट गिलमोर ने इसे “घोर मानवीय त्रासदी” बताया था। उन्होंने साफ कहा था कि यह घटना स्वास्थ्य सेवाओं की गंभीर खामियों को उजागर करती है, और महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना जरूरी है।

सिस्टम पर उठे सवाल, जो आज भी बाकी हैं

यह मामला सिर्फ एक डॉक्टर या एक शिविर की गलती नहीं माना गया, बल्कि पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े हुए। परिवार नियोजन के लक्ष्य का दबाव, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी या फिर निगरानी और जवाबदेही का अभाव। आज 11 साल बाद भी ये सवाल पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं।

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