बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने कहा है कि जो इलाके मध्य प्रदेश के बंटवारे से पहले एक ही राज्य में थे, उनके बीच आकर बसने को दूसरे राज्य में पलायन नहीं माना जा सकता। इस आधार पर किसी का जाति प्रमाणपत्र का दावा खारिज नहीं किया जा सकता। जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की बेंच ने राजनांदगांव की पल्लवी मेश्राम की याचिका मंजूर कर ली और उनका दावा खारिज करने वाले दोनों आदेश रद्द कर दिए। अब अधिकारी को 60 दिन में वजह बताते हुए नया फैसला लेना होगा।
दो बार खारिज हुआ था पल्लवी का आवेदन
डोंगरगढ़ की पल्लवी मेश्राम ने महार अनुसूचित जाति का प्रमाणपत्र मांगा था। एसडीओ राजस्व डोंगरगढ़ ने 12 अगस्त 2022 को आवेदन खारिज कर दिया। इसके बाद अपर कलेक्टर राजनांदगांव ने भी 9 फरवरी 2024 को अपील खारिज कर दी। अधिकारियों का कहना था कि पल्लवी के पूर्वज मध्य प्रदेश के बालाघाट के रहने वाले थे। परिवार के पास 10 अगस्त 1950 से पहले आज के छत्तीसगढ़ में रहने का पक्का कागजी सबूत नहीं है। पल्लवी के वकील लव कुमार रामटेके ने कहा कि उनके पिता 1987 से डोंगरगढ़ में रह रहे हैं और पल्लवी का जन्म भी यहीं हुआ। मध्य प्रदेश के बंटवारे से पहले बालाघाट और डोंगरगढ़ एक ही राज्य में थे। इसलिए पुराने कागजों को उस समय के हालात के साथ देखकर फैसला होना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का दिया गया हवाला
वकील ने सुप्रीम कोर्ट के दो फैसलों का हवाला दिया। ये हैं पंकज कुमार बनाम झारखंड राज्य और अखिलेश प्रसाद बनाम झारखंड लोक सेवा आयोग। राज्य सरकार ने कहा कि पल्लवी 1950 से पहले छत्तीसगढ़ में अपने पूर्वजों के रहने का भरोसेमंद सबूत नहीं दे पाईं। अधिकारियों ने मौजूद कागजों के आधार पर ही फैसला लिया था।
हाई कोर्ट ने क्यों नहीं माना पलायन
हाई कोर्ट ने कहा कि बालाघाट और डोंगरगढ़ पहले एक ही मध्य प्रदेश का हिस्सा थे। इसलिए इसे एक राज्य से दूसरे राज्य में जाना नहीं माना जा सकता। सिर्फ इसलिए दावा खारिज करना ठीक नहीं कि 1950 से पहले के छत्तीसगढ़ के कागज नहीं हैं। अधिकारियों को पुराने रिकॉर्ड, राज्य के बंटवारे के हालात और 2013 के नियमों के तहत मौजूद कागजों को देखना चाहिए था।
अब आगे क्या होगा
कोर्ट ने मामला अधिकारी को वापस भेज दिया है। उन्हें पल्लवी को अपनी बात रखने का मौका देकर 60 दिन में फैसला करना होगा। पल्लवी मूल निवास प्रमाणपत्र और दूसरे कागज भी जमा कर सकती हैं। हाई कोर्ट ने सीधे जाति प्रमाणपत्र जारी करने का आदेश नहीं दिया है। उसने सिर्फ यह कहा है कि अधिकारी दावे पर कानून के हिसाब से दोबारा विचार करें।