पीओके में जनविद्रोह

पीओके का जनविद्रोह और भारत की रणनीति

पीओके में राजनीतिक प्रतिनिधित्व के संकट और पाकिस्तानी सेना के बढ़ते हस्तक्षेप के खिलाफ व्यापक जनविद्रोह उभरा है।

By : स्वदेश डेस्क
पीओके का जनविद्रोह और भारत की रणनीति

मेजर सरस त्रिपाठी

पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके), जिसे पाकिस्तान आधिकारिक रूप से 'आजाद जम्मू एवं कश्मीर' कहता है, इन दिनों अपने इतिहास के सबसे गंभीर राजनीतिक जनआंदोलनों का सामना कर रहा है।राजनीतिक प्रतिनिधित्व के प्रश्न से शुरू हुआ यह आंदोलन अब पाकिस्तान की शासन व्यवस्था, आर्थिक नीतियों और विशेष रूप से सेना के बढ़ते हस्तक्षेप के विरुद्ध व्यापक जनविद्रोह का रूप ले चुका है। पीओके की राजधानी मुजफ्फराबाद, नियंत्रण रेखा के निकट बसे प्रमुख नगर रावलाकोट, मीरपुर, कोटली, सुधनोटी और हजीरा जैसे प्रमुख शहरों में आंदोलन अधिक उग्र है। इन शहरों में सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों के बीच हुई झड़पों में अनेक लोगों की मृत्यु तथा दर्जनों लोगों के घायल होने की खबरें सामने आई हैं। अंतरराष्ट्रीय मीडिया के अनुसार, एक ही दिन की हिंसा में कम से कम नौ लोगों की मृत्यु हुई, जबकि स्थानीय संगठनों का दावा है कि जून 2026 से अब तक लगभग तीस लोगों की जान जा चुकी है।

ज्वाइंट अवामी एक्शन कमेटी (Joint Awami Action Committee या JAAC) के नेतृत्व में चल रहे इस आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि जनता का आक्रोश केवल पाकिस्तान की निर्वाचित सरकार तक सीमित नहीं है, बल्कि उसका बड़ा हिस्सा पाकिस्तान की सेना और उसके प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर की ओर भी निर्देशित है। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि पीओके की वास्तविक सत्ता इस्लामाबाद की बजाय रावलपिंडी स्थित सैन्य मुख्यालय (जनरल हेडक्वार्टर) के हाथों में है।

आंदोलन के प्रमुख कारण

1. राजनीतिक प्रतिनिधित्व का संकट

वर्तमान आंदोलन का तत्काल कारण पीओके विधानसभा की 12 आरक्षित सीटों को लेकर उत्पन्न विवाद है। ये सीटें पाकिस्तान में रह रहे तथाकथित कश्मीरी शरणार्थियों के लिए आरक्षित हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि इन सीटों के माध्यम से इस्लामाबाद विधानसभा की संरचना को प्रभावित करता है और पीओके के वास्तविक निवासियों की लोकतांत्रिक आवाज को कमजोर करता है।

2. वर्षों से चली आ रही प्रशासनिक उपेक्षा

यह आंदोलन अचानक नहीं उभरा। वर्ष 2024 और 2025 में भी पीओके में महंगी बिजली, महंगा गेहूं, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और स्थानीय स्वायत्तता की मांग को लेकर व्यापक आंदोलन हुए थे। सरकार ने उस समय कुछ आश्वासन दिए, परंतु अधिकांश समस्याओं का समाधान नहीं हुआ। परिणामस्वरूप जनता का अविश्वास और असंतोष लगातार बढ़ता गया।

3. पाकिस्तान का आर्थिक संकट

पिछले कुछ वर्षों से पाकिस्तान गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की शर्तों के कारण सरकार को सब्सिडी घटानी पड़ी, बिजली और ईंधन की कीमतें बढ़ानी पड़ीं तथा करों में वृद्धि करनी पड़ी। परिणामस्वरूप आटे से लेकर बिजली तक के दाम बढ़ गए। पीओके के लोगों की शिकायत है कि उनके क्षेत्र में विशाल जलविद्युत परियोजनाएं होने के बावजूद उन्हें सस्ती बिजली उपलब्ध नहीं कराई जाती। उनका मानना है कि उनके प्राकृतिक संसाधनों का लाभ पाकिस्तान उठाता है, जबकि स्थानीय जनता को उसका उचित हिस्सा नहीं मिलता।

4. सेना का बढ़ता हस्तक्षेप

पीओके में लंबे समय से यह धारणा रही है कि वास्तविक प्रशासन निर्वाचित सरकार नहीं, बल्कि पाकिस्तान की सेना और आईएसआई जैसी खुफिया एजेंसियां संचालित करती हैं। स्थानीय राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों का आरोप है कि महत्वपूर्ण निर्णय रावलपिंडी (सेना मुख्यालय) में लिए जाते हैं और मुजफ्फराबाद की निर्वाचित सरकार केवल औपचारिक भूमिका निभाती है।

इसी कारण प्रदर्शनकारियों का गुस्सा सीधे सेना और उसके प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर की ओर भी दिखाई देता है।

5. आंदोलन पर कठोर दमन

सरकार द्वारा बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां, इंटरनेट सेवाओं पर प्रतिबंध, अतिरिक्त सुरक्षा बलों की तैनाती तथा प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध बल प्रयोग ने आंदोलन को दबाने के बजाय और अधिक व्यापक बना दिया है। विभिन्न समाचार रिपोर्टों के अनुसार, हाल के दिनों में लगभग डेढ़ लाख लोगों ने रावलाकोट सहित अनेक स्थानों पर प्रदर्शन में भाग लिया।

फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के विरुद्ध नाराजगी क्यों?

पाकिस्तान की राजनीति में सेना दशकों से सबसे शक्तिशाली संस्था रही है। अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक जगत में एक मजाक प्रचलित है कि "विश्व के प्रमुख देशों के पास सेना है, जबकि पाकिस्तानी सेना के पास एक देश है।" राष्ट्रीय सुरक्षा, भारत नीति और कश्मीर से जुड़े अधिकांश रणनीतिक निर्णयों में सेना की प्रमुख भूमिका मानी जाती है।

इसी कारण जब जनता प्रशासनिक विफलताओं, आर्थिक संकट अथवा राजनीतिक हस्तक्षेप के लिए जिम्मेदार व्यक्तियों की पहचान करती है, तो उसका आक्रोश केवल निर्वाचित सरकार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सेना के शीर्ष नेतृत्व तक पहुंच जाता है।

हालांकि यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि प्रदर्शनकारियों द्वारा लगाए गए आरोप उनकी राजनीतिक धारणा को व्यक्त करते हैं। उपलब्ध सार्वजनिक साक्ष्य यह सिद्ध नहीं करते कि प्रत्येक प्रशासनिक निर्णय व्यक्तिगत रूप से फील्ड मार्शल आसिम मुनीर द्वारा लिया गया था। इसलिए इस विषय का विश्लेषण तथ्यों और जनभावनाओं दोनों के बीच संतुलन बनाए रखते हुए किया जाना चाहिए।

क्या यह आंदोलन भारत के पक्ष में विलय की मांग कर रहा है?

भारत में कुछ अति उत्साही लोग परोक्ष रूप से इसे भारत में विलय के लिए एक आंदोलन मानते हैं। वर्तमान उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ऐसा कहना उचित नहीं होगा कि पूरा आंदोलन भारत में विलय की मांग कर रहा है। अधिकांश प्रदर्शनकारी निम्नलिखित मांगें उठा रहे हैं

  1. विस्थापितों के नाम पर विधायिका में आरक्षित सीटों को समाप्त किया जाए। उनका आरोप है कि ये सीटें सेना और प्रशासन में दबदबा रखने वाली पंजाबी लॉबी अथवा उनकी कठपुतली बने लोगों के लिए आरक्षित की गई हैं।

  2. पीओके के निवासियों के हित में वास्तविक लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व और आर्थिक न्याय प्रदान किया जाए।

  3. पीओके पूरे पाकिस्तान की जलविद्युत उत्पादन क्षमता का 'पावरहाउस' है। इसलिए पीओके को सस्ती दरों पर बिजली तथा आवश्यक वस्तुएं उपलब्ध कराई जाएं।

  4. अधिक स्वायत्तता प्रदान की जाए। कहने को यह 'आजाद कश्मीर' है, परंतु आजादी कहीं नहीं है।

  5. गिरफ्तार कार्यकर्ताओं की बिना शर्त तत्काल रिहाई हो तथा मृतकों के शव उनके परिजनों को सौंपे जाएं।

  6. पाकिस्तानी रेंजर्स को पीओके से वापस बुलाया जाए और सेना के हस्तक्षेप में कमी की जाए।

अर्थात वर्तमान आंदोलन का मुख्य उद्देश्य पाकिस्तान की शासन व्यवस्था में सुधार और स्थानीय अधिकारों की रक्षा है, न कि भारत में विलय की कोई संगठित मांग।हाँ, इस बात की संभावना हो सकती है कि भारत स्थित सरकारी या गैर-सरकारी संगठन इस आंदोलन को सहयोग और समर्थन दे रहे हों। वैसे भी पूरा का पूरा पीओके, गिलगित और बाल्टिस्तान कानूनन (जम्मू-कश्मीर के महाराजा के विलय-पत्र अथवा Instrument of Accession के अनुसार) भारतीय गणराज्य का अभिन्न अंग है और भारत या भारतीयों द्वारा समर्थन अथवा हस्तक्षेप सर्वथा उचित है।

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