अजय विश्वरूप। जेनेरिक दवाओं का सबसे बड़ा उत्पादक देश भारत है। इसके बावजूद आम आदमी को सस्ती दवाएं नहीं मिलती हैं। भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने यह एक बुनियादी विरोधाभास है। संसद में जारी एक जानकारी बताती है कि कुल स्वास्थ्य खर्च का करीब 44 प्रतिशत लोग आज भी अपनी जेब से भर रहे हैं। हालांकि 2014 में यह प्रतिशत 62 था। साल 2023 का आंकड़ा बताता है कि लोगों ने 3।83 लाख करोड़ रुपये की राशि अस्पताल और दवाओं पर खर्च की है। नीति आयोग की रिपोर्ट कहती है कि सालाना 07 प्रतिशत आबादी बढ़ते स्वास्थ्य खर्च के कारण गरीबी की रेखा में जा रही है।
जेनेरिक में आगे, फिर भी सस्ती दवा से दूर क्यों है आम भारतीय
बड़ा सवाल यह है कि भारतीयों को सस्ती दवा क्यों नहीं मिल पा रही है? भारत सरकार ने जन औषधि केंद्रों का प्रयोग कर सस्ती दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने का ईमानदारी से प्रयास किया है। लेकिन सच्चाई यह है कि मजबूत फार्मा लॉबी के आगे सरकार अकेली पड़ती दिख रही है, क्योंकि सस्ती जेनेरिक दवाओं का चलन तब तक संभव नहीं है जब तक डॉक्टर इसे अपनी प्रैक्टिस में शामिल नहीं करेंगे। दूसरा सामाजिक मानसिकता का सवाल भी अहम है, क्योंकि धारणा बना ली गई है कि सरकारी या सस्ती दवाएं बेअसर होती हैं। जबकि तथ्य यह है कि जो दवाएं ब्रांड के नाम से बिकती हैं, वे मूलतः एक फार्मूलेशन पर ही बनती हैं। इसी फार्मूले पर ब्रांडेड दवा अलग अलग नाम से आकर्षक पैकेजिंग के साथ मिलती हैं।
ब्रांडेड दवा और जेनेरिक दवाओं के मूल्य में 20 से 700 प्रतिशत तक का अंतर है। बाजार में बड़े ब्रांड की दवाओं की बिक्री सुगठित मार्केटिंग तंत्र के माध्यम से होती है। दवा के रैपर पर ध्यान से देखें तो निर्माता कई दवाओं के एक ही होंगे, लेकिन उसे बाजार में बेचने वाली कंपनी अलग अलग हैं और उनके नाम अलग हैं। मूल बात यह कि फार्मूला सबका एक है। जाहिर है मामला केवल सरकार तक सीमित नहीं है। हमें यह भी जान लेना चाहिए कि पूरी दुनिया में हथियारों के बाद फार्मा इंडस्ट्री दूसरी सबसे बड़ी ग्लोबल मार्केट फोर्स है।
आंकड़े भी इसी तस्वीर की तरफ इशारा करते हैं। थिंक टैंक टॉफलर के अनुसार भारत में सालाना 32154 करोड़ रुपये का मुनाफा निजी दवा कंपनियां कमा रही हैं। हर 100 रुपये की बिक्री पर अकेले कंपनी की कमाई 20 रुपये है। देश में करीब 12 लाख मेडिकल स्टोर हैं, जिनमें 31 प्रतिशत स्टोर निजी अस्पताल में ही संचालित होते हैं। मोदी सरकार के प्रयासों से सस्ती जेनेरिक दवाओं के 20149 स्टोर देश भर में खोले जा चुके हैं।
भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग के अनुसार देश में दवा फार्मूलेशन की प्रचलित संख्या 2871 है, लेकिन हर फार्मूलेशन की औसतन 17 ब्रांडेड दवाएं बाजार में हैं जिनकी अलग अलग कीमतें हैं। भारत के डिजिटल दवा रजिस्ट्री में करीब 1।23 लाख ब्रांडेड दवाएं रजिस्टर हैं। जेनेरिक दवाओं यानी बिना ब्रांड की संख्या 10 हजार ही है। जन औषधि केंद्रों पर 2110 दवाएं ही उपलब्ध हैं। ब्रांडेड सर्जिकल आइटम की संख्या 98528 है, जबकि जेनेरिक पर महज 513 ही हैं। भारत अमेरिका, यूरोप सहित दुनिया के 200 देशों को हर साल करीब 2।05 लाख करोड़ की जेनेरिक दवाओं का निर्यात करता है।
2,700 की दवा, 27,000 का एमआरपी और सुप्रीम कोर्ट के सवाल
अब मूल मुद्दे पर आते हैं कि देश दुनिया के प्रमुख जेनेरिक दवा उत्पादकों और निर्यातकों में शामिल होने के बावजूद आम भारतीय परिवार के लिए बीमारी का इलाज आज भी भारी आर्थिक बोझ क्यों बना हुआ है। एक महत्वपूर्ण आंकड़ा भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि 2018 से देश में आयुष्मान भारत योजना भी लागू है, जिसमें अब तक करीब 14 करोड़ लोगों के उपचार पर अस्पतालों में 2।09 लाख करोड़ की बड़ी राशि मोदी सरकार खर्च कर चुकी है। कल्पना की जा सकती है कि अगर यह राशि मोदी सरकार वहन नहीं करती तो स्वास्थ्य पर भारतीय परिवारों का खर्च कहां तक जाता।
इसके बावजूद सच्चाई यह है कि दवा कंपनियां बेतहाशा मुनाफा कमा रही हैं। पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट में दवाओं और चिकित्सा उपभोग्य सामग्रियों की कीमतों का मुद्दा गंभीर रूप से उठा है। 29 सितंबर 2026 की सुनवाई में अदालत ने एक कैंसर की दवा के उदाहरण पर सवाल उठाया, जिसकी खुदरा विक्रेता तक पहुँचने की कीमत लगभग 2,700 रुपये बताई गई, जबकि पैक पर अधिकतम खुदरा मूल्य करीब 27,000 रुपये था। अदालत ने इस बड़े अंतर पर कड़ी टिप्पणी की।
24 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र सरकार ने भी सुप्रीम कोर्ट के समक्ष माना कि अस्पतालों में मरीजों को दवाओं और मेडिकल उपकरण पर अत्यधिक कीमतें चुकानी होती हैं। सरकार ने कुछ गैर-मूल्य-नियंत्रित कैंसर दवाओं पर 30 प्रतिशत मुनाफे की सीमा लगाने का प्रस्ताव रखा है। सरकार के अनुमान के मुताबिक, इससे संबंधित दवाओं की कीमतों में 20 से 70 फीसदी तक कमी संभव हो सकती है।
सुप्रीम अदालत ने सवाल उठाया है कि निर्माता से अस्पताल या मेडिकल स्टोर्स तक दवा पहुँचने की कीमत और मरीज से वसूली जाने वाली कीमत में इतना अंतर हो सकता है, तो इस अंतर को नियंत्रित करने के लिए व्यवस्था क्या कर रही है? असल में यह स्थिति मूल्य निर्धारण, पारदर्शिता और मरीज की सौदेबाजी की कमजोर स्थिति पर गंभीर सवाल भी उठाती है।
मूल्य नियंत्रण की व्यवस्था में कहां रह जाती है कमी
सरकारी व्यवस्था में तीन स्थितियां हैं। पहली स्थिति निर्धारित आवश्यक दवाओं यानी शिड्यूल फॉर्मूलेशन की है, जिनकी अधिकतम मूल्य-सीमा सरकार तय करती है। दूसरी स्थिति गैर-अनुसूचित दवाओं यानी नॉन शिड्यूल दवाओं की है, जिनकी शुरुआती कीमत निर्माता तय कर सकता है। सामान्यतः 12 महीने में 10 प्रतिशत तक कीमतें बढ़ाई जा सकती हैं। तीसरी स्थिति में केवल विशेष परिस्थितियों में कुछ दवाओं की कीमत पर जनहित में सरकार हस्तक्षेप कर सकती है। एनपीपीए के अनुसार 23 जून 2026 तक 935 निर्धारित फॉर्मूलेशन की मूल्य-सीमा तय की गई थी, जबकि आवश्यक दवाओं की राष्ट्रीय सूची में 2022 तक 388 दवाएं शामिल हैं।
भारत में दवाओं के मूल्य नियंत्रण की व्यवस्था ड्रग प्राइस कंट्रोल आर्डर 2013 यानी डीपीसीओ के तहत चलती है। इसे लागू करने की जिम्मेदारी राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण की है। यानी सभी दवाओं की कीमतें सरकार तय नहीं करती।
असल समस्या यह है कि आवश्यक दवाओं की मूल्य-सीमा होने के बावजूद बाजार में मौजूद हर ब्रांड, हर फॉर्मूलेशन और हर सर्जिकल उत्पाद एक समान सरकारी मूल्य नियंत्रण के दायरे में नहीं आता। गैर-अनुसूचित दवाओं पर वार्षिक मूल्य-वृद्धि की सीमा होने का अर्थ भी यह नहीं है कि उनकी शुरुआती कीमत कम या उचित ही होगी। 2026 में प्रस्तुत संसदीय समिति की रिपोर्ट के अनुसार, दवा बाजार का लगभग 82 फीसदी हिस्सा गैर-अनुसूचित फॉर्मूलेशन का है। समिति ने शुरुआती कीमतों, व्यापार मार्जिन और मूल्य नियंत्रण की कमियों की समीक्षा करने की सिफारिश की है। वस्तुतः यही वह नीतिगत अंतर है जिस पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए। कीमतों में सालाना वृद्धि रोकना और शुरुआत से ही दवा को किफायती बनाना दो अलग लक्ष्य हो सकते हैं।
मरीज अक्सर डॉक्टर द्वारा लिखे गए ब्रांड को ही खरीदता है। उसे उसी दवा के दूसरे सस्ते विकल्पों की जानकारी नहीं होती या वह विकल्प बदलने में संकोच करता है। इससे कीमतों की तुलना करने और सस्ती समान दवा चुनने की उसकी क्षमता सीमित हो जाती है।
अस्पताल के भीतर भी खरीद और बिलिंग का खेल है। अस्पताल में इस्तेमाल होने वाली दवा, इंजेक्शन, कैथेटर, सर्जिकल किट और अन्य उपभोग्य सामग्रियों की खरीद कीमत और मरीज से वसूली जाने वाली कीमत अलग होती है। भर्ती मरीज के पास कई बार बाहर से खरीदने या कीमत की तुलना करने का व्यावहारिक विकल्प ही नहीं होता है।
सर्जिकल सामान की कीमत का सवाल भी उतना ही बड़ा है। मेडिकल उपकरण और सर्जिकल आइटम दोनों पर एक ही तरह की मूल्य-सीमा लागू नहीं है। एनपीपीए ने कुछ विशिष्ट उपकरणों, जैसे कोरोनरी स्टेंट और घुटने के इम्प्लांट, की कीमतों को नियंत्रित किया है। कुछ अन्य चिकित्सा उपकरणों पर भी विशेष परिस्थितियों में व्यापार मार्जिन की सीमा लगाई गई है। लेकिन इसके बावजूद हर सर्जिकल आइटम का मूल्य नियंत्रित नहीं है, इसीलिए 02 रुपये की सीरिंज 20 रुपये तक बिकती है।
निजी अस्पतालों में दवाओं के दाम का मामला सबसे गंभीर है। जब कोई निजी अस्पताल में भर्ती होता है तो उसे वहीं के मेडिकल स्टोर पर निर्भर रहना पड़ता है, खासकर नामी अस्पताल इसमें आगे है। इसके लिए सरकार को कुछ नीतिगत कदम उठाने चाहिए। निर्माता या आपूर्तिकर्ता से अस्पताल की खरीद कीमत क्या है, अस्पताल द्वारा मरीज से वसूली गई कीमत क्या है और उसी या समकक्ष गुणवत्ता वाले उत्पाद की दूसरी जगह उपलब्ध कीमत क्या है, यह देखा जाना चाहिए। यदि खरीद मूल्य और मरीज से वसूली गई कीमत में बहुत अधिक अंतर है, तो उसके आधार और औचित्य की जाँच होनी चाहिए। अंतर अपने आप में अवैध मुनाफे का प्रमाण नहीं है, लेकिन अपारदर्शी बिलिंग मरीज के हितों के विरुद्ध जाती है। इसके लिए विनियमन बहुत आवश्यक हो गया है।
दवाओं की कीमतों पर ठोस समीक्षा क्यों जरूरी
मरीजों को राहत देने के लिए जरूरी दवाओं की सूची, कंपनियों के मुनाफे और अस्पतालों की बिलिंग व्यवस्था की नियमित निगरानी जरूरी है। जन औषधि केंद्रों पर दवाओं की पर्याप्त उपलब्धता और कीमतों में पारदर्शिता भी होनी चाहिए।
आवश्यक दवाओं की सूची और मूल्य-नियंत्रण की समीक्षा एक आवश्यक और नियमित कार्य होना चाहिए। नियमित अंतराल पर सूची की समीक्षा हो और ऐसी जरूरी दवाओं की पहचान की जाए जिनकी कीमतें मरीजों की पहुँच से बाहर जा रही हैं। अत्यधिक मार्जिन वाले उत्पादों की पहचान के लिए खरीद मूल्य, वितरण लागत और खुदरा कीमत के आँकड़ों की निगरानी का मैकेनिज्म बनाया जाना चाहिए। आवश्यकतानुसार मुनाफे पर सीमा लगाना भी अनिवार्य बनाया जाए।
दवाओं और मेडिकल उपकरण की खरीद कीमत, मरीज से वसूली गई कीमत और लगाए गए शुल्कों का स्पष्ट विवरण अभी भी आम नहीं है। यह अनिवार्य किया जाना अब आवश्यक हो गया है। जन औषधि केंद्र खोलने की संख्या महत्वपूर्ण है, लेकिन इससे ज्यादा महत्वपूर्ण है कि अधिकतर दवाओं की वहां उपलब्धता हो। अभी जितने केंद्र खुले हैं, वहां 50 प्रतिशत दवाएं जेनेरिक के साथ ब्रांडेड बेची जा रही हैं। मरीज से निर्धारित एमआरपी से अधिक कीमत वसूले जाने या नियंत्रित दवा की अधिक कीमत पर बिक्री की शिकायत एनपीपीए और संबंधित राज्य औषधि नियंत्रण प्राधिकरण के समक्ष करने की व्यवस्था तो है। इसके लिए टोल-फ्री नंबर 1800-11-1255 भी उपलब्ध है, लेकिन इसका जमीन पर कोई प्रचार नहीं है। हर मेडिकल स्टोर पर इसकी सूचना को अनिवार्य नहीं बनाया गया।
वस्तुतः भारत की जेनेरिक दवा निर्माण क्षमता एक बड़ी उपलब्धि है। लेकिन निर्माण में सक्षम होना, दवा का कम कीमत पर उत्पादन करना और मरीज तक उसे किफायती दर पर पहुँचाना, ये तीन अलग-अलग स्तर हैं।
सुप्रीम कोर्ट में उठे सवाल और केंद्र सरकार द्वारा स्वीकार की गई मूल्य-संबंधी चिंताएं यह संकेत देती हैं कि केवल कुछ आवश्यक दवाओं की कीमतें नियंत्रित करना पर्याप्त नहीं हो सकता। व्यापार मार्जिन, गैर-अनुसूचित दवाओं की शुरुआती कीमतें, अस्पतालों की बिलिंग और सर्जिकल उपकरणों की खरीद व्यवस्था की भी समीक्षा जरूरी है। नीतिगत कसौटी यह होनी चाहिए कि मरीज को समान गुणवत्ता और चिकित्सकीय प्रभाव वाली उपयुक्त दवा उचित कीमत पर मिले, और अस्पताल के बिल में हर बड़ी लागत का औचित्य स्पष्ट हो। दवा उद्योग की उत्पादन क्षमता का वास्तविक सामाजिक लाभ तभी होगा जब वह आम आदमी के उपचार खर्च में दिखाई दे।