जयारोग्य में लाखों का कॉटन घोटाला
ग्वालियर/सुजान सिंह बैस। जयारोग्य चिकित्सालय जहां एक ओर अव्यवस्थाओं के लिए चर्चाओं में बना रहता है। वहीं अस्पताल प्रबंधन अपने चहेतों को फायदा पहुंचाने के लिए घोटाले करने में लगा हुआ है। जिसका उदाहरण जयारोग्य में पिछले करीब तीन माह से घटिया गुणवत्ता की कॉटन खरीदी जा रही है।
दरअसल जयारोग्य चिकित्सालय में कॉटन खरीदी के लिए टेण्डर निकाले गए हैं। इसमें जो संस्थान सबसे कम दर पर कॉटन उपलब्ध कराएगी, उसे कार्य दिया जाएगा। टेण्डर में एल-1 (प्रथम न्यूनतम दर) स्तर पर सुरेश मेडिकल स्टोर आया, जबकि एल-2 (द्वितीय न्यूनतम दर ) पर यश इन्टर प्राइजेश आया। इसी के चलते सुरेश मेडिकल स्टोर को करीब दस से पन्द्रह लाख रुपए के वर्क आर्डर दिए गए। लेकिन सुरेश मेडिकल स्टोर द्वारा सप्लाई ही नहीं दी गई। ऐसे में अगर 30 दिन तक सुरेश मेडिकल स्टोर सप्लाई नहीं कर पाता तो यह आदेश एल-2 (द्वितीय न्यूनतम दर) को दिया जाता है। लेकिन अस्पताल प्रबंधन के कुछ अधिकारियों व कर्मचारियों ने सुरेश मेडिकल से सांठगांठ कर दूसरी फर्म को आदेश ही नहीं दिए और पिछले करीब तीन माह से अपने स्तर पर कॉटन की खरीदी की जा रही है। इतना ही नहीं यह खरीदी भी सुरेश मेडिकल स्टोर से ही की जा रही है और जो कॉटन विभागों में पहुंचाई जा रही है। वह भी बहुत घटिया गुणवत्ता की है। जिसकी कई शिकायतें स्टोर प्रभारी के पास भी पहुंची। जब मामला तूल पकड़ा तो आनन-फानन में एल-2 को ऑर्डर देने की बात कही गई। इस मामले में जब सेन्ट्रल स्टोर प्रभारी डॉ. अक्षत पाठक से बात की गई तो उन्होंने बताया कि खराब गुणवत्ता की कॉटन भेजने की शिकायतें विभाग से प्राप्त हुई है, इसलिए दूसरी फर्म को आदेश किया जा रहा है।
इसलिए हुआ घोटाला
टेण्डर के नियम अनुसार अगर एल-1 स्तर पर फार्म 30 दिन तक सप्लाई नहीं कर पाता तो यह आदेश द्वितीय न्यूनमत एल-2 को किया जाता है। इसके साथ ही एल-1 व एल-2 के अंतर की राशि एल-1 सप्लायर से वसूली जाती है। साथ ही राशि वसूलने की जिम्मेदारी अस्पताल के प्रशासनिक अधिकारी की होती है। ऐसे में अब यह सवाल खड़े हो रहे हैं कि पिछले तीन माह से प्रतिदिन अपने स्तर पर क्यों की जा रही थी और एल-2 स्तर को ऑर्डर करते हुए एल-1 से वसूली क्यों नहीं कि गई।
प्रतिदिन खरीदे जा रहे करीब 100 बन्डल
अस्पताल के विभिन्न विभागों में प्रतिदिन करीब 100 के करीब कॉटन के बंडल उपयोग में आते हैं। ऐसे में अगर सप्लाई नहीं होती तो विभागों से कॉटन खरीदी के लिए इन्डेन की जाती है। इन्डेन पर अस्पताल अधीक्षक डॉ. अशोक मिश्रा के हस्ताक्षर होने के बाद स्टोर के माध्यम से स्थानीय खरीदी के लिए चले जाते हैैं। इसके बाद स्थानीय खरीदी कर सप्लायर स्टोर में सप्लाई करता है, जहां से यह कॉटन विभागों में पहुंचाई जाती है।
गुणवत्ता की भी नहीं की जांच
टेण्डर के दौरान कॉटन की गुणवत्ता भी सत्यापन समिति द्वारा देखी जाती है। उसके बाद कॉटन को पास किया जाता है। लेकिन स्थानीय खरीदी के माध्यम से जो कॉटन खरीदी की जा रही है, वह पास किए गए नमूने की नकली हैं। इतना ही नहीं गुणवत्ता को देखना भी स्टोर के प्रभारी की जिम्मेदारी होती है, लेकिन प्रभारी इतने दिनों से चुप्पी क्यों साधे हुए थे, यह समझ से परे है।
क्रय शाखा के नोडल अधिकारी भी जिम्मेदार
अगर नियमानुसार खरीदी नहीं की गई तो इसकी जिम्मेदारी क्रय शाखा के नोड़ल अधिकारी जितेन्द्र अग्रवाल की होती है। लेकिन नोड़ल अधिकारी श्री अग्रवाल का कहना है कि अगर एल-1 सप्लाई नहीं करता तो एल-2 को ऑर्डर देने के लिए नोट शीट चलाई जाती है, उसके बाद ही आर्डर किए जाते हैं। लेकिन अब यह सवाल खड़े हो रहे हैं कि पिछले तीन माह से नोड़ल अधिकारी द्वारा कोई कार्रवाई क्यों नहीं की गई।
इनका कहना है
''आपके द्वारा मुझे इस मामले की जानकारी मिली है। अस्पताल प्रबंधन से इस संबंध में विस्तृत जानकारी ली जाएगी और जांच भी करवाई जाएगी।''
-विजयलक्ष्मी साधौ, चिकित्सा शिक्षा मंत्री