चंद्रहासिनी मंदिर: धर्म, आस्था और लोक कथाओं का संगम, नदी में फेंके गए बच्चे को माता ने समेटा था आंचल में

Update: 2025-03-31 02:51 GMT
Chandrahasini Temple

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प्राचीन और सिद्ध 52 शक्तिपीठों में से एक की मान्यता

Chandrahasini Temple Chandrapur : चंद्रपुर। प्रदेश के नवनिर्मित जिला सक्ती के चंद्रपुर में महानदी के तट पर स्थित मां चंद्रहासिनी का मंदिर एक प्राचीन और सिद्ध शक्तिपीठ के रूप में प्रसिद्ध है। यह रायगढ़ व सारंगढ़ से लगा हुआ है। यह मंदिर मां दुर्गा के 52 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है, जहां भक्तों की हर मनोकामना पूरी होने की मान्यता है। प्राकृतिक सुंदरता से घिरा यह धार्मिक स्थल न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि ओडिशा और अन्य राज्यों से भी श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। यहां की पौराणिक कथाएं, मंदिर की संरचना और परंपराएं इसे और भी खास बनाती हैं।

चंद्रमा आकार की प्रतिमा बनाती है विशेष

मां चंद्रहासिनी को संतानदायिनी माता के रूप में पूजा जाता है। भक्तों का मानना है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई हर मुराद पूरी होती है। मंदिर की मूर्ति चंद्रमा आकार की होने के कारण चंद्रहासिनी या चंद्रसेनी दाई कहा जाता है।

एक मान्यता के अनुसार

एक मान्यता के अनुसार, मां सती का बायां कपोल यहां गिरा था, जिसके कारण यह शक्तिपीठ बना। नवरात्रि के दौरान यहां 108 दीपों के साथ महाआरती होती है, जो भक्तों के लिए अलौकिक अनुभव होता है। मां के दर्शन के बाद नदी के बीच स्थित नाथलदाई मंदिर के दर्शन की परंपरा भी प्रचलित है, ऐसा न करने पर माता के नाराज होने की मान्यता है।

मंदिर का इतिहास

मंदिर का इतिहास लोक कथाओं में मिलता है, जो इसे चंद्रसेन मंदिर के नाम से भी संबोधित करते हैं। यहां की चंद्राकार मूर्ति को लेकर कहा जाता है कि यह स्वयंभू (प्रकृति से प्रकट) है, जिसे बाद में मंदिर के रूप में विकसित किया गया। मध्यकाल में कलचुरि और मराठा शासकों ने इस मंदिर की देखभाल और संरक्षण में योगदान दिया। 19वीं और 20वीं शताब्दी में स्थानीय जमींदारों और भक्तों ने मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया, जिससे इसका वर्तमान स्वरूप बना। 20वीं शताब्दी के मध्य में यहां झांकियों और अन्य संरचनाओं को जोड़ा गया, जो इसे एक प्रमुख तीर्थ स्थल के रूप में स्थापित करने में सहायक रहीं। आज यह मंदिर आधुनिकता और परंपरा का संगम बन चुका है।

 

नदी में बच्चे को फेंकने की कहानी

चंद्रहासिनी मंदिर से जुड़ी एक लोकप्रिय कथा भक्तों में श्रद्धा बढ़ाती है। कहा जाता है कि बहुत समय पहले एक निर्दयी पुलिसवाले ने अपने छोटे बच्चे को चंद्रपुर के पुल से महानदी में फेंक दिया था। लेकिन मां चंद्रहासिनी और उनकी छोटी बहन नाथलदाई ने उस मासूम को अपने आंचल में समेट लिया और उसकी जान बचा ली। इस चमत्कार के बाद से मां पर भक्तों का विश्वास और गहरा हो गया। यह कहानी आज भी स्थानीय लोगों के बीच चर्चित है और मंदिर की महिमा को बढ़ाती है।

लंबे पुल में से एक के निकट विराजित नाथलदाई

महानदी के बीच टापू पर स्थित मां नाथलदाई का मंदिर चंद्रहासिनी मंदिर से लगभग 1.5 किलोमीटर की दूरी पर है। इस मंदिर तक पहुंचने के लिए एक पुल बनाया गया है, जिसकी लंबाई करीब 300 मीटर है। यह पुल नदी के मध्य से होकर गुजरता है और भक्तों को नाथलदाई के दर्शन के लिए ले जाता है। यह पुल प्रदेश की सबसे लंबी पुल में से एक है। मान्यता है कि यह मंदिर कभी बाढ़ में नहीं डूबता, चाहे महानदी में पानी कितना ही बढ़ जाए। यह चमत्कार भक्तों के लिए आश्चर्य और श्रद्धा का विषय है। नाथलदाई को चंद्रहासिनी की छोटी बहन माना जाता है और दोनों के दर्शन को पूर्ण तीर्थ माना जाता है।

 

मंदिर की विशषताएं

  • झांकियां और मूर्तियां: मंदिर में अर्धनारीश्वर, हनुमान, कृष्ण लीला, महिषासुर वध और महाभारत काल की चलती झांकियां हैं, जो भक्तों को पौराणिक कथाओं से जोड़ती हैं।
  • गुफा और अन्य संरचनाएं: परिसर में एक रहस्यमयी सुरंग, निरीक्षण टावर और तारामंडल भी हैं, जो पर्यटकों को रोमांच का अनुभव कराते हैं।
  • प्राकृतिक सौंदर्य: महानदी, मांड और लात नदी के संगम का विहंगम दृश्य यहां से देखा जा सकता है।
  • अन्य मंदिर: पास में गोपाल जी, राम मंदिर और साईं मंदिर भी हैं, जो इस क्षेत्र को और पवित्र बनाते हैं।

बलि प्रथा का इतिहास और वर्तमान स्थिति

चंद्रहासिनी मंदिर में बलि प्रथा वर्षों से चली आ रही थी। यहां भक्त अपनी मनोकामना पूरी होने पर बकरे और मुर्गियों की बलि चढ़ाते थे। बताया जाता है कि हर साल 1000 से 1500 बकरों की बलि दी जाती थी, खासकर शारदीय और चैत्र नवरात्रि के दौरान यह संख्या बढ़ जाती थी। एक समय में प्रतिदिन 200-300 बकरों की बलि का अनुमान था। यह परंपरा मंदिर की स्थापना के समय से शुरू हुई मानी जाती है और इसे बदना या मन्नत के रूप में देखा जाता था।

 

चंद्रहासिनी चंद्रपुर, बलिप्रथा से रहना दूर

हालांकि, समय के साथ इस प्रथा के खिलाफ आवाजें उठने लगीं। भक्तों और सामाजिक संगठनों ने इसे धार्मिक कुरीति मानकर बंद करने की मांग की। चंद्रहासिनी चंद्रपुर, बलिप्रथा से रहना दूर के नारों से बलि प्रथा को बंद कराने की मुहिम कई धार्मिक संगठनों द्वारा की गई। चंद्रहासिनी मंदिर ट्रस्ट ने भक्तों की भावनाओं का सम्मान करते हुए बड़ा फैसला लिया। शारदीय नवरात्रि 2024 के बाद इस प्रथा पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है। मंदिर परिसर में बोर्ड लगाकर श्रद्धालुओं को सूचित किया गया कि अब बलि प्रथा स्वीकार नहीं की जाएगी। यह निर्णय आधुनिकता और परंपरा के बीच संतुलन का प्रतीक माना जा रहा है।

वर्जन

मंदिर की मान्यता बहुत है। यहां निषाद समाज के बैगा द्वारा अनुष्ठान कराया जाता है। बलिप्रथा में पंड़वे की बलि सारंगढ़ के राजपरिवार की कुलदेवी में दी जाती है जो मुख्य मंदिर के बगल में है। ये कुंवार नवरात्रि में किया जाता है। एकबार सात बहनें खाना खा रही थी जिसे बैगा ने देख लिया, जिसे वो किसी को नहीं बता पाया, उसके बाद से वह गूंगा हो गया।

-मोरध्वज राघवेंद्र दर्शन, ग्रामवासी चंद्रपुर

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