मोबाइल की लत से साढ़े चार साल की उम्र में फिजियोथेरेपी की नौबत!: मोबाइल गेम्स के कारण बच्चों में बढ़ रही आत्महत्या की प्रवृत्ति…

डिजिटल डिटॉक्स से कम हो सकता है बच्चों का स्क्रीन टाइम;

Update: 2025-03-31 06:26 GMT
मोबाइल गेम्स के कारण बच्चों में बढ़ रही आत्महत्या की प्रवृत्ति…
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अनुराग तागड़े, इंदौर: मोबाइल आज बच्चों की दिनचर्या का एक हिस्सा बन गया है। 4 से 5 साल के छोटे बच्चों को इसकी लत से कई स्वास्थ्य समस्याएं हो रही हैं। हालात यह हैं कि साढ़े चार साल के एक बच्चे को फिजियोथेरेपी की जरूरत पड़ी, क्योंकि वह दिनभर मोबाइल चलाता था।

चिकित्सकों का कहना है कि अत्यधिक मोबाइल उपयोग से छोटे बच्चों में मांसपेशियों की कमजोरी, आंखों की रोशनी पर असर, मानसिक तनाव और व्यवहार संबंधी समस्याएं बढ़ रही हैं। वहीं विश्व स्वास्थ्य संगठन का मानना है कि 5 साल से कम उम्र के बच्चों को स्क्रीन के सामने एक घंटे से अधिक समय नहीं बिताना चाहिए। वहीं 2 साल से छोटे बच्चों को स्क्रीन से पूरी तरह दूर रखना चाहिए।

बच्चों पर स्क्रीन टाइम के दुष्प्रभाव:

-गर्दन और कंधों में दर्द

-आंखों की रोशनी पर असर

-मोटापा आलस्य

-चिड़चिड़ापन और गुस्सा

-एकाग्रता में कमी

चौंकाने वाले आंकड़े:

- नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो 2023 की रिपोर्ट के अनुसार, 10-18 वर्ष के बच्चों में आत्महत्या के मामलों में 25 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है, जिनमें एक बड़ा कारण मोबाइल और ऑनलाइन गेमिंग की लत है।

-2022 में पबजी जैसे गेम्स के कारण 15 से अधिक बच्चों की आत्महत्या के मामले दर्ज हुए।

-एक सर्वे के अनुसार 12 वर्ष तक के 42 प्रत‍िशत बच्चे प्रतिदिन औसतन 2 से 4 घंटे मोबाइल या टैबलेट का उपयोग करते हैं।

- लगभग 23.8त्न बच्चे सोने से पहले मोबाइल चलाते हैं।

- लगभग 37.15त्न बच्चों ने स्मार्टफोन के अत्यधिक उपयोग के कारण एकाग्रता में कमी का अनुभव किया है।

क्या है डिजिटल डिटॉक्स

डिजिटल डिटॉक्स का मतलब है कुछ समय के लिए डिजिटल डिवाइस से दूर रहना ताकि मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को बेहतर किया जा सके।

नो-फोन जोन बनाएं : बेडरूम या डाइनिंग एरिया में फोन और लैपटॉप न रखें।

स्क्रीन टाइम ट्रैक करें : यह जानना जरूरी है कि आप कितनी देर डिजिटल डिवाइस पर बिता रहे हैं।

डिजिटल ब्रेक लें : हर कुछ घंटों में ब्रेक लें और आंखों को आराम दें।

सोशल मीडिया की लिमिट तय करें : दिन में कुछ निश्चित समय ही सोशल मीडिया पर बिताएं।

रियल वर्ल्ड एक्टिविटीज करें : किताबें पढ़ें, आउटडोर एक्टिविटी करें या दोस्तों से आमने-सामने मिलें।

बच्चों में डिजिटल लत को कम करने के लिए 'डिजिटल डिटॉक्स' जरूरी

बच्चों में डिजिटल लत को कम करने के लिए 'डिजिटल डिटॉक्स' एक महत्वपूर्ण कदम है, जिसमें तकनीकी उपकरणों के उपयोग को सीमित किया जाता है। भारत में कुछ केंद्र इस दिशा में कार्यरत हैं।

बेंगलुरु का राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य और तंत्रिका विज्ञान संस्थान इंटरनेट और तकनीकी लत के उपचार के लिए विशेष क्लीनिक संचालित करता है, जहां बच्चों और युवाओं को परामर्श और उपचार प्रदान किया जाता है।

इसी तरह दिल्ली के फोर्टिस मेंटल हेल्थकेयर द्वारा डिजिटल डिटॉक्स कार्यक्रम आयोजित कर बच्चों को तकनीकी लत से निपटने में सहायता करते हैं। कई स्कूल और गैर-सरकारी संगठन बच्चों में माइंडफुलनेस और ध्यान के माध्यम से डिजिटल डिटॉक्स को बढ़ावा दे रहे हैं।

कुछ राज्यों जैसे महाराष्ट्र और राजस्थान में बच्चों को डिजिटल डिटॉक्स से जोड़ने के लिए विशेष पहल की गई हैं। स्कूलों में नो-फोन डे लागू किया गया, ताकि बच्चे मोबाइल से दूर रहें।

कई ग्राम पंचायतों ने डिजिटल उपवास की पहल शुरू की है, जहाँ सप्ताह में एक दिन मोबाइल का उपयोग नहीं किया जाता।

झारखंड और बिहार में शिक्षकों द्वारा डिजिटल डिटॉक्स जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है, जिससे बच्चों को तकनीक का सही उपयोग सिखाया जा सके।

नुकसानदायक मोबाइल गेम्स

फ्री फायर : यह बैटल रॉयल गेम बेहद लोकप्रिय है, लेकिन इसमें हिंसा और प्रतिस्पर्धात्मक तनाव होता है।

पबजी/बीजीएमआई: प्रतिबंधित होने के बावजूद यह गेम अभी भी कुछ तरीकों से खेला जा सकता है, जो किशोरों में आक्रामकता बढ़ा रहा है।

कॉल ऑफ ड्यूटी : इसमें भी हिंसक दृश्यों और मल्टीप्लेयर प्रतियोगिता की वजह से बच्चों में चिड़चिड़ापन बढ़ रहा है।

फोर्टनाइट: रंगीन ग्राफिक्स होने के बावजूद इसमें माइक्रो ट्रांजेक्शन्स और अत्यधिक स्क्रीन टाइम की समस्या है।

रॉबलाक्स: इस गेम में बच्चों के लिए उपयुक्त कंटेंट होता है, लेकिन इसमें ऑनलाइन बातचीत और साइबर बुलिंग का खतरा भी रहता है।

सबवे सर्फर और कैंडी क्रश ये सीधे नुकसान नहीं पहुंचाते, लेकिन इनके प्रयोग से डोपामाइन रिलीज के कारण बच्चों को स्क्रीन की लत लग सकती है।

बच्चों में गर्दन दर्द की शिकायत लेकर आते हैं माता-पिता

लगातार स्क्रीन देखने और एक ही मुद्रा में बैठे रहने से बच्चे की गर्दन और कंधों में तनाव बढ़ रहा है। इससे फिजियोथेरेपी की जरूरत पड़ रही है। इतना ही नहीं कई बार माता-पिता बच्चों के गर्दन दर्द को लेकर आते हैं और कहते हैं कि स्कूल का बैग भारी है, इस कारण गर्दन में दर्द है, जबकि बच्चा ज्यादा मोबाइल चलाते हैं यह नहीं बताते।

- डॉ.अभिषेक श्रोत्री, फिजियोथेरेपिस्ट, इंदौर

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